राजनीति बुद्ध काल से ही बौद्ध धर्म का हिस्सा रही है। जैसा कि हमें पालि त्रिपिटिक साहित्य में राजाओं, राजकुमारों, युद्धों और नीतियों के बारे में कई संदर्भ देखने को मिलते हैं। बाद के पालि साहित्य विशेषकर पालि वंश साहित्य में इसके साथ बाद के लिखे गये ग्रन्थों जिसमें अनुपिटक अथवा पिटकेत्तर साहित्य के ग्रन्थ आदि में आज तक शासकों को अच्छी तरह से शासन करने के तरीके के बारे में सलाह, खराब शासन के दुष्परिणामों के बारे में चेतावनी और अहंकार से बचने तथा आम लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करने की नसीहतें शामिल हैं। राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में ऐतिहासिक भगवान बुद्ध के समय से बौद्ध धर्म ने सरकारों को प्रभावित किया है, और सरकारों द्वारा उनके अधिकार और वैधता के श्रोत के रूप में पहचाना गया। बौद्ध राजाओं ने पिछले दो हजार वर्षों में कई बार दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में बौद्ध बहुल क्षेत्रों पर शासन किया है। आज भी एशिया के कई देश अपनी सरकारों को बौद्ध मूल्यों के अनुरूप शासन करने का कर्तव्य समझते हैं। कई अन्य एशियाई देशों में बौद्ध धर्म एक महत्वपूर्ण नैतिक और धार्मिक परंपरा है, भले ही इसे राजनीतिक व्यवस्था में स्पष्ट रूप से शामिल न किया गया हो। बौद्ध धर्म और राजनीत के बीच सम्बंध के इस लंबे इतिहास के बावजूद 20वीं सदी में पश्चिमी विद्वता दो चरणों से गुजरी - एक प्रारम्भिक चरण जो मैक्स बेवर से प्रभावित था, जिसने बौद्ध धर्म को या तो अराजनीतिक या यहां तक कि अराजनीतिक के रूप में देखा, और केवल अनुयायिओं को जन्म, मृत्यु और संसार चक्र मुक्ति अर्थात निर्वाण करने पर ध्यान केन्द्रित किया, और एक बाद का चरण जिसमें पश्चिमी विद्वानों ने बौद्ध धर्म के राजनीतिक लेखन और इतिहास केा अधिक ध्यानपूर्वक अध्ययन करना सुरू किया। जिससे बौद्ध परम्परा में मानक राजनीतिक विचार और बौद्धों द्वारा, बौद्ध धर्म के नाम पर राजनीति का जटिल अभ्यास पता चला। इस प्रकार बौद्ध धर्म में कोई राजनीतिक प्रचार शामिल है या नहीं इस पर पहले के विवाद की जगह अब अधिक शूक्ष्म बहसों ने ले ली है, कि उन प्राथमिक ग्रन्थों की व्याख्या कैसे की जाए जो राजाओं और कानूनों जैसी चीजों पर खुलकर चर्चा करते हैं। इस बारे में कि क्या वे ग्रन्थ राजशाही या गणतंत्रवाद के लिए मानक वरीयता को दर्शाते हैं, और बौद्ध राजनीतिक सोच की भविष्य की दिशा के बारे में। (इस सब के बाद भी आज भी कई बौद्ध लोग बौद्ध धर्म को सही मायने में अराजनीतिक मानते हैं।) इसके अलावा भी कई संकीर्ण प्रश्न हैं जिन पर विद्वान ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। जैसे कि उन देशों में राजनीतक और कानूनी व्यवस्था कितनी ’’बौद्ध’’ है, जहां नाममात्र रूप से बौद्ध धर्म से प्रेरित या निर्देशित सरकारें हैं, बौद्ध धर्म और मानवाअधिकार और अन्तर्राष्ट्रीय कानून जैसे विचारों के बीच अनुकूल या असंगति है, और उन विभिन्न तरीकेें को कैसे समझा जाए, जिनसे आज बौद्ध लोग राजनीतिक कार्यवाई में संलग्न हैं।
बौद्ध बहुल देशों में जहां बौद्ध धर्म संविधान में अंतर्निहत है- बौद्धों का बहुमत बौद्ध धर्म पर आधारित कानून के पक्ष में है। जिसमें थाईलैण्ड 56 प्रतिशत बौद्धों से लेकर कंबोडिया में लगभग सभी 96 प्रतिशत का समर्थन है। इन देशों में उत्तरदाताओं के पास राजनीति में धार्मिक नेजाओं की अपनी पसंदीदा भूमिका के बारे में ेई तरह के विचार हैं। हांलांकि अधिकांश उत्तर दाता इस बात से सहमत हैं कि धार्मिक नेताओं को राजनीतिक चुनावों में मतदान करना चाहिए। लेकिन इस बात पर राय अलग-अलग है कि उन्हें राजनेता होना चाहिए। राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना चाहिए या सार्वजनिक रूप से अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने चाहिए। उदाहरण के लिए कंबोडियाई बौद्धों के थाई बौद्धों की तुलना में यह कहने की संभावना काफी अधिक है कि धार्मिक नेताओं को राजनीति विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना चाहिए या राजनेता होना चाहिए।
इन सबसे बाद भी आज की सच्चाई ये है कई बौद्ध देशों में जहां का राजधर्म ही बौद्ध धर्म है कई धार्मिक नेताओं को राजनेता की भूमिका में देखा गया है। उदहारण के लिए हाल के कुछ वर्षों में श्रीलंका जैसे बौद्ध देश में भी कई धार्मिक नेताओं को चुनाव जीत कर वहां की संसद का प्रतिनित्व करते देखा गया है। ऐसा उदहारण अन्य देशों में भी देखा गया है। भारत में भी कुछ कुछ ऐसा दिख ही जाता है।