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वर्तमान परिपेक्ष्य में बुद्ध की प्रासंगिकता

आज सम्पूर्ण विश्व में हिंसा, सामाजिक भेदभाव, छल-कपट, चोरी-ठगई के साथ-साथ व्यभिचार चरम सीमा पर बड़ रहा है। आज मनुष्य उपरोक्त आचरण रूपी विचारों से हिंसात्मक होता जा रहा है। आज हम भले ही अपनी तरक्की मानकर के डिजिटल युग में खुश हो रहे हों, किन्तु सच्चाई ये भी है कि इस डिजिटल युग में उपरोक्त आचरणों की मनुष्य के विचारों में नई-नई योजनाओं को जन्म दे रहा है। जिससे व्यभिचार एवं चोर, ठगई, हिंसा जैसी घटनाऐं नित्य नये पैमाने पर बढ़ रही हैं, फिर चाहे दो देशों के मध्य युद्ध जैसे हालात क्यों न हों।

ऐसी विकट परिस्थिति में भगवान बुद्ध की शिक्षाऐं (बौद्ध धर्म) कहीं ज्यादा प्रासांगिक हो जातीं हैं। व्यक्ति के विनाशकारी विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना नितान्त आवश्यक हो गया है, और इस कार्य मे बुद्ध की शिक्षाओं से वेहतर कोई मार्ग प्रतीत नहीं होता है। भगवान बुद्ध ने आज से लगभग 2600 साल पहले मानवीय प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि मनुष्य का मन ही सारे कर्मों का प्रधान एवं नियंत्रित कर्ता है। क्यों कि समस्त कर्मों के विचार सर्वप्रथम मनुष्य के मन में ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए मनुष्य की गलत प्रवृतित्तयों को नियंत्रण करने के लिए उसके मन में सद्विचारों का प्रवाह कर उसे सद्मार्ग पर ले जाना जरूरी है। भगवान बुद्ध ने यही सद्मार्ग बौद्ध धर्म के रूप में हमें दिया है। अतः आज मनुष्यों को उपरोक्त कथित कुप्रवृत्तियों आदि से मुक्ति पाने के लिए बुद्ध की शिक्षाओं (बौद्ध धर्म) को समझने की जरूरत है। विशेषकर आज की युवा पीढ़ी को तो नितान्त आवश्यक हो जाता है। बुद्ध की शिक्षाओं को जानने के साथ ही मन को नियंत्रण रखने हेतु बुद्ध द्वारा खोजी गई आनापान एवं विपस्सना जैसी ध्यान विद्या का अनुशरण करना भी आवश्यक हो जाता है।

भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और राजनीतिक स्वतंत्रता व समानता की शिक्षा दी है। भगवान बुद्ध ने संसारिक दुःखों को समझने उनको कम करने के लिए चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया। वे आर्य सत्य उनके उपदेशों के मूल आधार भी हैं। इसके साथ चौथे आर्य सत्य के रूप में आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने की भी बात की है, जिससे जीवन में व्याप्त दुःखों का क्षय किया जा सके। इसके साथ ही मध्यम मार्ग का उपदेश देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा, ’’मनुष्य को सभी प्रकार के आकर्षण एवं कायक्लेष से वचना चाहिए। अर्थात न तो अत्याधिक इच्छाऐं करनी चाहिए न ही अत्याधिक दमन ही करना चाहिए, वल्कि इनके बीच का मार्ग अपना कर दुःख निरोध का प्रयास करना चाहिए, ऐसे ही न अधिक कंजूसी करनी चाहिए और न अधिक फिजूल खर्ची ही करनी चाहिए, (भगवान बुद्ध हमेशा आय से अधिक खर्चे के विरोध में रहे हैं और कंजूसी के भी) अर्थात दो अतियों के बीच मध्यम स्थिति में रहना चाहिए। दोनों तरह की अति बुरी है, बीच का रास्ता ही ठीक एवं सुखदायक होता है।’’ (अपनी आय का कुछ हिस्सा कुशल कार्यों, दान परकल्याण आदि में लगाना चाहिए यह बौद्ध आचरण में आता है)

भगवान बुद्ध कहते हैं ’’कि जो व्यक्ति अपने जीवन-आचरण को ठीक रखेगा, तथा सही संकल्प से युक्त होगा, जिसकी बाणी, कर्म आदि अच्छे होंगे, जिन्होंने जीवन यापन के लिए भ्रष्टाचार-मुक्त साधन चुने होंगे जो अपनी इन्द्रियों पर नियत्रण रखने के लिए प्रयत्शील होगा, वह दुःख-मुक्त होगा।’’

आज समूची दुनियां हिंसा, धार्मिक उन्माद, जातीय टकराव, वैमनुष्यता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसकारण संसार में मानव अस्तित्व के लिए बड़े और गंभीर खतरे खड़े हो गये हैं। आज इंसान ने जहां विज्ञान, तकनीकी विकास और उसके उपयोग में समृद्धि हासिल कर ली है, तो दूसरी ओर, स्वार्थ, लोभ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, नशा आदि भावनाओं के वशीभूत होकर वह आपसी कलह, लूट-खसोट आदि विनाशकारी मार्ग को भी अपना रखा है। इसलिए आज दुनियां में भौतिक सम्पदा के साथ-साथ मानव अस्तित्व को भी वचाना जरूरी हो गया है। इसके लिए मनुष्य के विनाशकारी एवं कलुषित विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना आवश्यक हो जाता है।

आज भारत सहित विश्व में धार्मिक टकराव दिखाई दे रहा है, जो हम सबके लिए बड़ी चिन्ता और चुनौती का विषय है। भारत में तो शायद सबसे ज्यादा ऐसा हो रहा है। अब तक इसके कारण न जाने कितने निर्दोंष लोगों की जाने तक जा चुकीं हैं। अगर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक अधिकार को बचाना है, तो बौद्ध धर्म के धार्मिक सहिष्णुता, करूणा और मैत्री के सिद्धांतों को अपनाना जरूरी है। इस धार्मिक टकराव के पीछे के कारण हो सकता कि धर्म का विज्ञान और तर्क के आधार पर खरा न उतर पाना हो, किन्तु बौद्ध धर्म विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है। बौद्ध धर्म विज्ञानवादी और परिवर्तनशील होने के कारण विज्ञान के साथ चलने और जरूरत पड़ने पर अपने को बदलने में सक्षम है। इसीलिए बोधिसत्व बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था-’’यदि भविष्य की दुनियां को धर्म की जरूरत होगी, तो इसको केवल बौद्ध धर्म ही पूरा कर सकता है’’। वल्कि हम कह सकते हैं कि यदि भविष्य में मानव के अस्तित्व को यदि कोई धर्म या विचार बचा सकते हैं तो वह बुद्ध के धर्म और विचार ही होंगे।

भगवान बुद्ध ने अपने ग्रहस्थ शिष्यों के लिए जो पंचशील दिये वे आज भी समाज और देश दुनियां के लिए उतने ही प्रांसांगिक हैं। बुद्ध के विचारों को हम अपने आचरण में लाकर शांति-पूर्ण मानवता, नैतिकता और मूल्यों पर आधारित समाज की कल्पना कर सकते हैं, साथ ही अहिंसा पर आधारित विश्व में शान्ति सद्भावना और कल्याण की कल्पना भी कर सकते हैं।