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बौद्ध धर्म और राजनीति

राजनीति बुद्ध काल से ही बौद्ध धर्म का हिस्सा रही है। जैसा कि हमें पालि त्रिपिटिक साहित्य में राजाओं, राजकुमारों, युद्धों और नीतियों के बारे में कई संदर्भ देखने को मिलते हैं। बाद के पालि साहित्य विशेषकर पालि वंश साहित्य में इसके साथ बाद के लिखे गये ग्रन्थों जिसमें अनुपिटक अथवा पिटकेत्तर साहित्य के ग्रन्थ आदि में आज तक शासकों को अच्छी तरह से शासन करने के तरीके के बारे में सलाह, खराब शासन के दुष्परिणामों के बारे में चेतावनी और अहंकार से बचने तथा आम लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करने की नसीहतें शामिल हैं। राजनीतिक व्यवहार के क्षेत्र में ऐतिहासिक भगवान बुद्ध के समय से बौद्ध धर्म ने सरकारों को प्रभावित किया है, और सरकारों द्वारा उनके अधिकार और वैधता के श्रोत के रूप में पहचाना गया। बौद्ध राजाओं ने पिछले दो हजार वर्षों में कई बार दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में बौद्ध बहुल क्षेत्रों पर शासन किया है। आज भी एशिया के कई देश अपनी सरकारों को बौद्ध मूल्यों के अनुरूप शासन करने का कर्तव्य समझते हैं। कई अन्य एशियाई देशों में बौद्ध धर्म एक महत्वपूर्ण नैतिक और धार्मिक परंपरा है, भले ही इसे राजनीतिक व्यवस्था में स्पष्ट रूप से शामिल न किया गया हो। बौद्ध धर्म और राजनीत के बीच सम्बंध के इस लंबे इतिहास के बावजूद 20वीं सदी में पश्चिमी विद्वता दो चरणों से गुजरी - एक प्रारम्भिक चरण जो मैक्स बेवर से प्रभावित था, जिसने बौद्ध धर्म को या तो अराजनीतिक या यहां तक कि अराजनीतिक के रूप में देखा, और केवल अनुयायिओं को जन्म, मृत्यु और संसार चक्र मुक्ति अर्थात निर्वाण करने पर ध्यान केन्द्रित किया, और एक बाद का चरण जिसमें पश्चिमी विद्वानों ने बौद्ध धर्म के राजनीतिक लेखन और इतिहास केा अधिक ध्यानपूर्वक अध्ययन करना सुरू किया। जिससे बौद्ध परम्परा में मानक राजनीतिक विचार और बौद्धों द्वारा, बौद्ध धर्म के नाम पर राजनीति का जटिल अभ्यास पता चला। इस प्रकार बौद्ध धर्म में कोई राजनीतिक प्रचार शामिल है या नहीं इस पर पहले के विवाद की जगह अब अधिक शूक्ष्म बहसों ने ले ली है, कि उन प्राथमिक ग्रन्थों की व्याख्या कैसे की जाए जो राजाओं और कानूनों जैसी चीजों पर खुलकर चर्चा करते हैं। इस बारे में कि क्या वे ग्रन्थ राजशाही या गणतंत्रवाद के लिए मानक वरीयता को दर्शाते हैं, और बौद्ध राजनीतिक सोच की भविष्य की दिशा के बारे में। (इस सब के बाद भी आज भी कई बौद्ध लोग बौद्ध धर्म को सही मायने में अराजनीतिक मानते हैं।) इसके अलावा भी कई संकीर्ण प्रश्न हैं जिन पर विद्वान ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। जैसे कि उन देशों में राजनीतक और कानूनी व्यवस्था कितनी ’’बौद्ध’’ है, जहां नाममात्र रूप से बौद्ध धर्म से प्रेरित या निर्देशित सरकारें हैं, बौद्ध धर्म और मानवाअधिकार और अन्तर्राष्ट्रीय कानून जैसे विचारों के बीच अनुकूल या असंगति है, और उन विभिन्न तरीकेें को कैसे समझा जाए, जिनसे आज बौद्ध लोग राजनीतिक कार्यवाई में संलग्न हैं।

बौद्ध बहुल देशों में जहां बौद्ध धर्म संविधान में अंतर्निहत है- बौद्धों का बहुमत बौद्ध धर्म पर आधारित कानून के पक्ष में है। जिसमें थाईलैण्ड 56 प्रतिशत बौद्धों से लेकर कंबोडिया में लगभग सभी 96 प्रतिशत का समर्थन है। इन देशों में उत्तरदाताओं के पास राजनीति में धार्मिक नेजाओं की अपनी पसंदीदा भूमिका के बारे में ेई तरह के विचार हैं। हांलांकि अधिकांश उत्तर दाता इस बात से सहमत हैं कि धार्मिक नेताओं को राजनीतिक चुनावों में मतदान करना चाहिए। लेकिन इस बात पर राय अलग-अलग है कि उन्हें राजनेता होना चाहिए। राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना चाहिए या सार्वजनिक रूप से अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करने चाहिए। उदाहरण के लिए कंबोडियाई बौद्धों के थाई बौद्धों की तुलना में यह कहने की संभावना काफी अधिक है कि धार्मिक नेताओं को राजनीति विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना चाहिए या राजनेता होना चाहिए।

इन सबसे बाद भी आज की सच्चाई ये है कई बौद्ध देशों में जहां का राजधर्म ही बौद्ध धर्म है कई धार्मिक नेताओं को राजनेता की भूमिका में देखा गया है। उदहारण के लिए हाल के कुछ वर्षों में श्रीलंका जैसे बौद्ध देश में भी कई धार्मिक नेताओं को चुनाव जीत कर वहां की संसद का प्रतिनित्व करते देखा गया है। ऐसा उदहारण अन्य देशों में भी देखा गया है। भारत में भी कुछ कुछ ऐसा दिख ही जाता है।

वर्तमान परिपेक्ष्य में बुद्ध की प्रासंगिकता

आज सम्पूर्ण विश्व में हिंसा, सामाजिक भेदभाव, छल-कपट, चोरी-ठगई के साथ-साथ व्यभिचार चरम सीमा पर बड़ रहा है। आज मनुष्य उपरोक्त आचरण रूपी विचारों से हिंसात्मक होता जा रहा है। आज हम भले ही अपनी तरक्की मानकर के डिजिटल युग में खुश हो रहे हों, किन्तु सच्चाई ये भी है कि इस डिजिटल युग में उपरोक्त आचरणों की मनुष्य के विचारों में नई-नई योजनाओं को जन्म दे रहा है। जिससे व्यभिचार एवं चोर, ठगई, हिंसा जैसी घटनाऐं नित्य नये पैमाने पर बढ़ रही हैं, फिर चाहे दो देशों के मध्य युद्ध जैसे हालात क्यों न हों।

ऐसी विकट परिस्थिति में भगवान बुद्ध की शिक्षाऐं (बौद्ध धर्म) कहीं ज्यादा प्रासांगिक हो जातीं हैं। व्यक्ति के विनाशकारी विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना नितान्त आवश्यक हो गया है, और इस कार्य मे बुद्ध की शिक्षाओं से वेहतर कोई मार्ग प्रतीत नहीं होता है। भगवान बुद्ध ने आज से लगभग 2600 साल पहले मानवीय प्रवृत्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि मनुष्य का मन ही सारे कर्मों का प्रधान एवं नियंत्रित कर्ता है। क्यों कि समस्त कर्मों के विचार सर्वप्रथम मनुष्य के मन में ही उत्पन्न होते हैं। इसलिए मनुष्य की गलत प्रवृतित्तयों को नियंत्रण करने के लिए उसके मन में सद्विचारों का प्रवाह कर उसे सद्मार्ग पर ले जाना जरूरी है। भगवान बुद्ध ने यही सद्मार्ग बौद्ध धर्म के रूप में हमें दिया है। अतः आज मनुष्यों को उपरोक्त कथित कुप्रवृत्तियों आदि से मुक्ति पाने के लिए बुद्ध की शिक्षाओं (बौद्ध धर्म) को समझने की जरूरत है। विशेषकर आज की युवा पीढ़ी को तो नितान्त आवश्यक हो जाता है। बुद्ध की शिक्षाओं को जानने के साथ ही मन को नियंत्रण रखने हेतु बुद्ध द्वारा खोजी गई आनापान एवं विपस्सना जैसी ध्यान विद्या का अनुशरण करना भी आवश्यक हो जाता है।

भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों में सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और राजनीतिक स्वतंत्रता व समानता की शिक्षा दी है। भगवान बुद्ध ने संसारिक दुःखों को समझने उनको कम करने के लिए चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया। वे आर्य सत्य उनके उपदेशों के मूल आधार भी हैं। इसके साथ चौथे आर्य सत्य के रूप में आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने की भी बात की है, जिससे जीवन में व्याप्त दुःखों का क्षय किया जा सके। इसके साथ ही मध्यम मार्ग का उपदेश देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा, ’’मनुष्य को सभी प्रकार के आकर्षण एवं कायक्लेष से वचना चाहिए। अर्थात न तो अत्याधिक इच्छाऐं करनी चाहिए न ही अत्याधिक दमन ही करना चाहिए, वल्कि इनके बीच का मार्ग अपना कर दुःख निरोध का प्रयास करना चाहिए, ऐसे ही न अधिक कंजूसी करनी चाहिए और न अधिक फिजूल खर्ची ही करनी चाहिए, (भगवान बुद्ध हमेशा आय से अधिक खर्चे के विरोध में रहे हैं और कंजूसी के भी) अर्थात दो अतियों के बीच मध्यम स्थिति में रहना चाहिए। दोनों तरह की अति बुरी है, बीच का रास्ता ही ठीक एवं सुखदायक होता है।’’ (अपनी आय का कुछ हिस्सा कुशल कार्यों, दान परकल्याण आदि में लगाना चाहिए यह बौद्ध आचरण में आता है)

भगवान बुद्ध कहते हैं ’’कि जो व्यक्ति अपने जीवन-आचरण को ठीक रखेगा, तथा सही संकल्प से युक्त होगा, जिसकी बाणी, कर्म आदि अच्छे होंगे, जिन्होंने जीवन यापन के लिए भ्रष्टाचार-मुक्त साधन चुने होंगे जो अपनी इन्द्रियों पर नियत्रण रखने के लिए प्रयत्शील होगा, वह दुःख-मुक्त होगा।’’

आज समूची दुनियां हिंसा, धार्मिक उन्माद, जातीय टकराव, वैमनुष्यता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसकारण संसार में मानव अस्तित्व के लिए बड़े और गंभीर खतरे खड़े हो गये हैं। आज इंसान ने जहां विज्ञान, तकनीकी विकास और उसके उपयोग में समृद्धि हासिल कर ली है, तो दूसरी ओर, स्वार्थ, लोभ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, नशा आदि भावनाओं के वशीभूत होकर वह आपसी कलह, लूट-खसोट आदि विनाशकारी मार्ग को भी अपना रखा है। इसलिए आज दुनियां में भौतिक सम्पदा के साथ-साथ मानव अस्तित्व को भी वचाना जरूरी हो गया है। इसके लिए मनुष्य के विनाशकारी एवं कलुषित विचारों को बदलना और उन पर नियंत्रण रखना आवश्यक हो जाता है।

आज भारत सहित विश्व में धार्मिक टकराव दिखाई दे रहा है, जो हम सबके लिए बड़ी चिन्ता और चुनौती का विषय है। भारत में तो शायद सबसे ज्यादा ऐसा हो रहा है। अब तक इसके कारण न जाने कितने निर्दोंष लोगों की जाने तक जा चुकीं हैं। अगर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक अधिकार को बचाना है, तो बौद्ध धर्म के धार्मिक सहिष्णुता, करूणा और मैत्री के सिद्धांतों को अपनाना जरूरी है। इस धार्मिक टकराव के पीछे के कारण हो सकता कि धर्म का विज्ञान और तर्क के आधार पर खरा न उतर पाना हो, किन्तु बौद्ध धर्म विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है। बौद्ध धर्म विज्ञानवादी और परिवर्तनशील होने के कारण विज्ञान के साथ चलने और जरूरत पड़ने पर अपने को बदलने में सक्षम है। इसीलिए बोधिसत्व बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था-’’यदि भविष्य की दुनियां को धर्म की जरूरत होगी, तो इसको केवल बौद्ध धर्म ही पूरा कर सकता है’’। वल्कि हम कह सकते हैं कि यदि भविष्य में मानव के अस्तित्व को यदि कोई धर्म या विचार बचा सकते हैं तो वह बुद्ध के धर्म और विचार ही होंगे।

भगवान बुद्ध ने अपने ग्रहस्थ शिष्यों के लिए जो पंचशील दिये वे आज भी समाज और देश दुनियां के लिए उतने ही प्रांसांगिक हैं। बुद्ध के विचारों को हम अपने आचरण में लाकर शांति-पूर्ण मानवता, नैतिकता और मूल्यों पर आधारित समाज की कल्पना कर सकते हैं, साथ ही अहिंसा पर आधारित विश्व में शान्ति सद्भावना और कल्याण की कल्पना भी कर सकते हैं।

विश्व शांति के निर्माण में बौद्ध साहित्य की भूमिका

बौद्ध धर्म को आम तौर पर, अच्छे कारण से , विश्व धर्मों में सबसे शान्तिपूर्ण माना जाता है। अन्य दक्षिण एशियाई धर्मां की तरह यह अहिंसा के सिद्धान्त, अन्य जीवित चीजों को ’’नुकसान न पहुंचाने’’ पर जोर देता है। शान्ति की अवधारणा बौद्ध धर्म के केन्द्र में है। इसलिए बुद्ध को ’’शान्तिराज’’ ’शान्ति का राजा कहा जाता है। दर्शन का अनुसरण करते हुए, बौद्ध साहित्य शान्ति, अहिंसा और मित्रता/मेत्ता पर जोर देता है। विश्व शान्ति को आगे बढाने में बौद्ध साहित्य की भूमिका निम्नलिखित मामलों में देखी जा सकती हैः-

अशोक के स्तंभ शिलालेख और शिलालेख घोशविजय ।शैन्य साधनों द्वारा विजय। के स्थान पर धम्मविजय ।धम्म द्वारा विजय। के गुणों का गुणगान करते हैं। इसने कुछ दशकों तक भारतीय उपमहाद्वीप और पडोस में शान्ति कायम की। इसने स्वतंत्रता के बाद भारत की शांतिवादी उपनिवेशवाद विरोधी विदेश नीति को भी प्रभावित किया। आधुनिक विश्व में समानता, शांति और अहस्तक्षेप पर आधारित विदेशी संबंधों के लिए भारत और चीन के बीच पंचशील की अवधारणा का प्रयोग किया गया है। यदि इस नीति को बड़े देश अपना लें तो अनेक संघर्श अनिवार्यतः समाप्त हो जायेंगे।

बौद्ध साहित्य स्वंय की जांच पर ध्यान केन्द्रित करता है, और जीवन के प्रति गैर भौतिकवादी दृश्टिकोण की ओर ले जाता है, जिससे संघर्श कम होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस आस्था के संस्थापक, गौतम बुद्ध ने प्रतिद्वन्धी कबीले, कोलियों के साथ पानी की आपूर्ति को लेकर चल रहे युद्ध को रोक दिया था। ऐसा माना जाता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में दक्षिण एशिया पर शासन करने वाले सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अपने पिछले जीवन में किए गए रक्तपात के लिए पश्चाताप महसूस हुआ था।

बौद्ध जीवन शैली का नेतृत्व करना, सामंजस्यपूर्ण निर्वाण अच्छा जीवन बनाए रखना है, जिसमें ’’समचरिया’’ शामिल है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, सामंजस्यपूर्ण जीवन या किसी के साथी के साथ रहने का शांतपूर्ण तरीका।

यह वह सिद्धान्त है, जो आंतरिक शांति देता है, जो बाहरी रूप सांमजस्यपूर्ण या धार्मिक जीवन जीने की अनुमति देता है, ’’धम्मचरिया। यह बात मानव इतिहास में पहली बार बुद्ध ने पूरी दुनिया को बताई, जब उन्होंने धार्मिकता का साम्राज्य-धम्मचक्क- स्थापित किया, जो वस्तुतः धार्मिकता का शासन था।

प्रेमपूर्ण मेत्ता/दया, करूणा, मुदिता/आनन्द और समभाव/उपेक्खा की चार असीम अवस्थाओं का अभ्यास करना। मेत्ता या सार्वभौमिक प्रेम की प्रथा, किसी के अपने अपने मन को सार्वभौमिक प्रेम/मेत्ता से भरने और फिर इसे अपने परिवार, फिर पडोसियों, फिर गांव और ब्राहमांड के बाहरी क्षेत्रों तक फैलाने से शुरू होती है।

संयुक्तनिकाय में यह स्पश्ट रूप से नोट किया गया है कि धर्मनिरपेक्ष दुनिया शांति और राजनीति को साकार करने के आदर्श की वकालत करती है। आगे बढ़ना चाहिए, ’’बिना हत्या किए, बिना चोट पहुंचाए, बिना विजय प्राप्त किए, बिना दुखी हुए, केवल धम्म के कानून का पालन करते हुए’’।

जब मगध के राजा आजातुशत्रु ने वज्जियों के पड़ोसी देश पर हमला करना चाहा, और अपने बुद्धिमान मंत्री वस्सकार के माध्यम से शाक्यमुनि बुद्ध की राय मांगी, तो बुद्ध ने उन्हें युद्ध में न जाने की सलाह दी- महापरिनिब्बान सुत्त।

बौद्ध धर्म में, आदर्श शासक को अपने देश पर आधुनिक नीतियों के साथ शासन करना चाहिए और अन्य देशों पर आक्रमण किए बिना शांति बनाए रखनी चाहिए। इस विचार को चीनी त्रिपिटिक में दोहरायागसा है। जिसमें उल्लेख किया गया है कि ’’एक राजा को एक राजा के कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए, जो उसके पूर्वजों द्वारा मनाए गए हैं, अपने देश में सभी विशयों का पालन-पोशण करें, रक्षा करें।’’ अपने देश और दूसरों के क्षेत्रों पर आक्रमण न कें। पाठ कहता है कि चक्रवर्तिन, लोगों को बलपूर्वक धमकी नहीं देता, हथियारों के बल पर मजबूर हुए बिना उसके समाने आत्मसमर्पण कर देते हैं।

किसी अन्य स्थान पर, बुद्धचरित में लिखा है कि शाक्यमुनि के पिता, राजा शुद्धोधन की प्रशंसा की जाती है कि बिना युद्ध के अच्छे कार्यों से अपने दुश्मनों को हराया था। युद्ध में शामिल होने से बचने के लिए, धर्मसमुच्चय सूत्र की की एक तकनीक का प्रस्ताव हैः ’भले ही किसी दूसरे देश की सेना आक्रमण करे और लूटपाट करे, राजा को पहले पता होना चाहिए कि उसके सैनिक बहादुर हैं या कायर हैं, और फिर समीचीन तरीके से शांति स्थापित करनी चाहिए।’

गुणवर्मन के नाम से जाने जाने वाले एक भारतीय भिक्षु ने शुरूआती दिनों में चीन का दौरा किया- एक चीनी राजा ने उनसे पूंछः जब विदेशी सेनाऐं मेरे देश पर आक्रमण करने वाली हों, तो मुझे क्या करना चाहिऐ? यदि हम लड़ेंगे तो बहुत से लोग हताहत होंगे। यदि हमने उनका प्रतिकार नही किया तो मेरा देश खतरे मे ंपड़ जायेगा। हे गुरू, कृपया मुझे बताऐं कि क्या करना है? भिक्षु ने उत्तर दियाः केवल दयालु मन का मनोरंजन करो, दुखदायी मन मत रखो। राजा ने उसकी सलाह पर अमल किया। जब झण्डे फहराये जाने वाले थे और ढोल बजाए जाने वाले थे, तो दुश्मन पीछे हट गए।

आत्मविश्वास, सहनशीलता और सद्भाव विकसित करने के लिए सामान्य मूल्यों या सर्वाभौमिक नैतिकता को विकसित करना बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए, शिक्षा, संवाद, सामाजिक और आर्थिक विकास को बढावा देने से दुनिया में शांति के सतत विकास को बढावा मिलेगा। हमें पूरे पालि साहित्य में साक्ष्य मिलते हैं, जहां भटकते हुए तपस्वी सोफिस्ट और दार्शनिक बुद्ध से मिलने आते हैं और आध्यात्मिक अभ्यास और मुक्ति के तरीके के बारे में अपने विभिन्न विचारों पर चर्चा या आदान प्रदान करते हैं। ब्रहम्मजाल सुत्त में बुद्ध ने अपने समकालीन शिक्षकों के मुख्य विचारों को निम्नलिखित शब्दों में संक्षेप में प्रस्तुत किया हैंः ’’ आप इस व्याख्या को ’लक्ष्य का जाल’, ’ सिद्धातों का जाल’, सर्वोच्च जाल’, ’धार्मिक जाल’, के रूप में याद कर सकते हैं। - दार्शनिक सिद्धान्त और विचारधाराओं के युद्ध में ’गौरवशाली जीत’’।

विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों को समझने के माध्यम से विश्व में शांति के निर्माण के लिए मार्ग प्रदान करना एक तत्काल आवश्यकता बन गई है, क्यों कि आज दुनियां में धार्मिक और जातिय संघर्श के कारणों की जड़े गलत धार्मिक मान्यताओं और पवित्र ग्रन्थों की गलत व्याख्या में हैं। इसलिए सीधे सपंर्क और संवाद के माध्यम से दूसरों की धार्मिक मान्यताओं को सीखकर समझ बढाने के लिए बुद्ध के ज्ञान को लागू करना महत्वपूर्ण है।

सभी पारंपरिक बौद्ध शिक्षाओं में से शायद सबसे प्रसिद्ध शि़क्षा तथाकथित मध्य मार्ग या चरम सीमाओं के बीच संयम के मार्ग पर जोर देना है। वासत्व में संयम और उसके सजातीय - संतुलन, सद्भाव, समता इत्यादि - को अक्सर सैद्धांतिक दृश्टिकोंण से और सार्वजनिक धारण में बुद्ध धर्म के अनुरूप जीवन जीने के मूल आधार के रूप में लिया जाता है।

एक गृहस्थ के लिए तथागत सम्यकसम्बुद्ध के उपदेश - दीघजानु सुत्त

भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और उनके धर्म को आज से लगभग 2600 वर्ष हो गये हैं। लेकिन क्या आज के दौर में भी बुद्ध की शिक्षाऐं उतनी ही प्रासांगिक हैं जितनी बुद्ध के समय में थीं? ये प्रश्न अक्सर अन्तर्रार्ष्टीय मंचों से उठता रहता है। सर्वप्रथम तो ये बात समझने की है कि सम्यकसम्बुद्ध के वचन सर्बकालिक सर्वभौमिक सत्य होती है। बुद्ध उन्हीं बातों को उपदेशित करते है जो सभी काल में एक समान हों, जिनमें काल के हिसाब से परिवर्तन न हो। सामाजिक परिवेश में सामाजिक समस्याऐं जितनी बुद्ध के समय में थीं, जिनके समाधान हेतु तथागत शाक्यमुनि बुद्ध ने उपदेश किया था। आज देखने में आता है कि जीवन के प्रति ऐसी समस्याऐं पहले की अपेक्षा और अधिक दुरूह हो गईं है। मानसिक रोगियों की संख्या आज के युग में अधिक बढ़ रहीं है। पति-पत्नी में क्लेश, आपसी सम्बंधों का टूटना, बच्चों में अपराधीपन की भावना का बढ़ना, क्यों कि तृष्णाऐं बढ़ रहीं उनके बढने से अनैतिक कार्य बढ़ रहे, जिनका कहीं अन्त नहीं दिखता। शाक्यमुनि बुद्ध के समय में समाज की स्थिति कमोवेश ऐसी ही थी। तथागत बुद्ध से ऐसे समस्याओं के समाधान हेतु काल्पनिक ईश्वर के स्थान पर शीलों को अधिक महत्व दिया। इतना ही नहीं तथागत ने मनुष्य जीवन को सार्थक और सुखमय बनाने के लिए शीलों को अतिमहत्वपूर्ण कहा। यही कारण है कि शाक्यमुनि बुद्ध के संदेश सीधे साधे और व्यावाहारिक है क्यों कि वे सीधे तौर पर मनुष्य मात्र के कल्याण की बात करते हैं, प्राणी मात्र को उन्नति की शिखर पर लेके जाते है। तथागत बुद्ध के प्रमुख वचनों को अर्थात सुत्तों को देखे तो वे सभी सीधे तौर पर मनुष्य को सामाजिक समस्याओं के छुटकारा दिलाते हुए, प्राणी मात्र को परम सुख के मार्ग पर लेकर जाते हैं, जिनमें प्रमुख सुत्त हैं। मंगल सुत्त, सिगालोवाद सुत्त, व्यग्धपज्ज सुत्त, पराभव सुत्त, निधिकण्ड सुत्त आदि। ये सभी सुत्त सीधे तौर पर प्राणी मात्र केे सुखी जीवन के मूलमंत्र की व्याख्या करते है। यदि कोई सद्ग्रहस्थ उक्त सुत्तों पर वर्णित बुद्धवचनों का पालन करता है, तो वह मूलभूत शील, धनोपार्जन तथा उसके संरक्षण से सामाजिक सम्बंधों के परस्पर उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए एक सफल व्यक्ति के गुणों से परिपूर्ण होता है।तथागत शाक्यमुनि बुद्ध द्वारा देशित उपरोक्त सूत्तों में एक है व्यग्धपज्ज सूत्त जिसमें भगवान एक समृद्धि गृहस्थ को निर्देश देते हैं कि कैसे वे अपनी समृद्धि का संरक्षण और संवर्धन कर सकते हैं और कैसे धन के विनाश से बच सकते हैं।

एक बार भगवान बुद्ध जब कोलिय प्रदेश के कर्करपत्र नामक कोलियों के निगम में विहार कर रहे थे। तब दीघजानु नामक एक कोलियपुत्र भगवान के पास गया और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ कर भगवान को सम्बोधित करते हुए प्रश्न किया।

’’भगवान! हम गृहस्थ लोग काम भोगों मे लिप्त रहते वाले हैं, पुत्रों पुत्रियों आदि परिवारिक लोगों के साथ अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करते रहते हैं। विभिन्न प्रकार के शौन्दर्य प्रशाधन करना, सोने चांदी आदि के आभूषणों का आदि का संग्रह करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य बन गया है। हम जैसे लोगों के लिए भी भगवान आप ऐसे धम्म की देशना करें जिस का आचरण करके हमारा यह जन्म और निर्वाण तक का मार्ग सुखकर और हितकर हो सके।’’

दीघजानु कोलिय पुत्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान ने कहा- ’’एक गृहस्थ के जीवन में मंगल और सुख के लिए चार साधन व्यग्धपज्ज सहायक होते हैं। यह चार साधन हैं’’- सतत प्रयास की उपलब्धि, उपलब्ध की रक्षा, अच्छी मित्रता अर्थात कल्याण मित्रता, तथा संतुलित जीविका’’।

1. निरंतर प्रयास की उपलब्धि (उत्थानपाद-सम्पदा)- इसमें, जिस किसी काम से गृहस्थ आजीविका अर्जित करता है चाहे खेती से, पशुपालन से, नौकरी से, व्यापार से या अन्य किसी भी संसाधनों से उसमें उसको पारंगत अर्थात निपुण होना चाहिए और आलस्य नहीं करना चाहिए। उसे अपने कार्य के उचित तौर तरीके भली भांति जानने चाहिए और अपने कार्य में निपुणता और दक्षता हासिल करनी चाहिए। यह निरंतर प्रयास की उपलब्धि (उत्थानपाद-सम्पदा) कहलाती है।

2. उलब्ध की रक्षा अर्थात आरक्ष-सम्पदा - ’’इसमें, जो सम्पत्ति एक गृहस्थ द्वारा मेहनत, ईमानदारी और सही तरीकों से कमाई गई होती है, उसे वह ऐसे देखभाल करके ऐसे संचालन करता है, ताकि उसको राजा हडप न ले, चोर उसे चुरा न सके, आग उसे जला न सके, पानी उसे वहा न दे और न ही भटके हुए उत्तराधिकारी उसे नष्ट कर सकें। यह उलब्ध की रक्षा अर्थात आरक्ष-सम्पदा कहलाती है।

3. कल्याण मित्रता - इसमें, जिस किसी ग्राम या शहर में गृहस्थ रहता है। वह जिससे जुड़ता है, बातचीत करता है, अन्य गृहस्थों या उनके पुत्रों के साथ बहस करता है, चाहे वह वृद्ध हो या युवा वे सुसंस्कृत हों, श्रद्धा सम्पन्न हों, शील कुशलता से परिपूर्ण हों, त्याग और बुद्धि से सम्पन्न हों। वह श्रद्धालुओं की श्रद्धा के अनुसार कार्य करता है, शीलवानों के शील के साथ, त्यागियों के त्याग के साथ, प्रज्ञावानों की प्रज्ञा के साथ। यह कल्याण मित्रता कहलाती हैं। (अधिक विस्तार के लिए सिगालोवाद सूत्र का अवलोकन किया जा सकता है)

4. संतुलित जीविका या समजीविता - एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय को जानते हुए एक संतुलित जीवन यापन करता है, न फिजूलखर्ची न कंजूसी, यह जानते हुए कि उसकी आय व्यय से बढ़कर रहेगी, न कि उसका व्यय आय से बढ़कर रहेगा। जैसे कि एक तुलाधर सुनार, या उसका शार्गिद तराजू पकड़कर जानता है कि कितना झुक गया है, कितना उठ गया है, उसी प्रकार एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय को जान कर संतुलित जीवन जीता है, न वह बेहद खर्चीला न बेहद कंजूस। इस प्रकार समझते हुए कि उसकी आय व्यय से बढ़कर रहेगी न कि उसका व्यय आय से अधिक होगा। यदि एक गृहस्थ कम आय वाला खर्चीला जीवन व्यतीत करेगा, तो लोग उसे कहेंगे कि यह व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ऐसे आनन्द ले रहा है जैसे कोई बेल फल खाता है। यदि एक प्रचुर आय वाला गृहस्थ कंजूसी का जीवन व्यतीत करेगा तो लोग कहेंगे कि, यह व्यक्ति भुक्कड़ की तरह मरेगा। इस प्रकार संचित धन सम्पत्ति चार प्रकार से नाश होती है-

 1. काम भोगों में संयम 
 2. मदिरापान में संयम 
 3. जुऐं में रत न होना 
 4. अच्छे लोगों से मित्रता, संगति तथा सांठ-गांठ ’
जैसे कि एक बड़ा तालाब हो जिसमें चार प्रवेश तथा चार निकास हों, यदि कोई व्यक्ति प्रवेश मार्ग खोल दे तथा निकास मार्ग बन्द कर दे तथा बारिश भी खूब हो जाये, तो उस तालाब में अवश्य ही जल बढ़ने की संभावना रहेगी तथा घटने की नहीं, इसी प्रकार ये चार बातें जमा पूंजी की वृद्धि के श्रोत हैं।’’ ये चार बातें एक गृहस्थ के इसी जीवन काल में कल्याण तथा प्रसन्नता में सहायक हैं’’- ’’आध्यात्मिक विकास के साधन- 
 1. श्रद्धा की उपलब्धि (श्रद्धा सम्पदा) 
 2. शीलों की उपलब्धि (शील सम्पदा) 
 3. त्याग की उपलब्धि (त्याग सम्पदा) 
 4. प्रज्ञा की उपलब्धि (प्रज्ञा सम्पदा) श्रद्धा की उपलब्धि - 
इसमें, एक गृहस्थ श्रद्धा सम्पन्न होता है, वह सम्यकसम्बुद्ध तथागत की बुद्धत्व उपलब्धि में आश्वस्त होता है, यथातथ्य वे सम्यकसम्बुद्ध हैं, पूर्णतया ज्ञान प्राप्त, विद्या तथा आचरणों से सम्पन्न, सुगत, लोंकों को जानने वाले, सिखाऐ जाने योग्य मनुष्यों के नायक, देव तथा मनुष्यों के गुरू, सर्वज्ञ तथा धन्य है, इसे कहते हैं श्रद्धा सम्पदा। शीलों की उपलब्धि - ’’इसमें एक गृहस्थ प्राणी हत्या से, चोरी से, यौन मिथ्याचार से, झूठ बोलने से तथा नशीले पदार्थ से जो स्मृतिनाश तथा प्रमाद उत्पन्न करते हैं- विरत रहता है। यह शील सम्पदा कहलाती है। त्याग की उपलब्धि - इसमें, एक गृहस्थ अपने चित्तमलों तथा धन लोलोपता से मुक्त रख कर घर में रहता है, त्याग में संलग्न, मुक्त हस्त उदारता में आनन्दित, जरूरमदों की सहायता करने वाला, दान दक्षिणा में प्रसन्न। यह कहलाता है- त्याग सम्पदा। प्रज्ञा की उपलब्धि- इसमें, एक गृहस्थ जो प्रज्ञावान है, वह ऐसी प्रज्ञा से सम्पन्न है, पंच स्कन्धों की उत्पत्ति तथा लय को समझता है, वह आर्य विपस्सना से सम्पन्न है। जो दुःख विमुक्ति का लाभ देती है। इसे कहते है प्रज्ञा की उपलब्धि- प्रज्ञा सम्पदा। ये चार बातें एक गृहस्थ के सुगति, कल्याण और प्रसन्नता के लिए सहायक हैं। अपने कर्तव्यों को ध्यान तथा मेहनत से करने वाला, बुद्धिमानी से धन संचय करने वाला, वह संतुलित जीवन व्यतीत करता है, संचित का संरक्षण करते हुए, श्रद्धा तथा शील से भी सम्पन्न, उदार तथा धनलोलुपता विहीन, सदा पथ शोधन को प्रवृत, जो सुगति के लिए कल्याणकर है। इस प्रकार श्रद्धा से ओत प्रोत गृहस्थ को उनके द्वारा, जिनका ’सम्यकसम्बुद्ध’ समुचित नाम है, यह आठ बातें बताई गई है जो इस जीवन और सुगति मेें भी आनन्दकर हैं। संसार के समस्त प्राणी सुखी और निर्भय हों!