भगवान बुद्ध की शिक्षाओं और उनके धर्म को आज से लगभग 2600 वर्ष हो गये हैं। लेकिन क्या आज के दौर में भी बुद्ध की शिक्षाऐं उतनी ही प्रासांगिक हैं जितनी बुद्ध के समय में थीं? ये प्रश्न अक्सर अन्तर्रार्ष्टीय मंचों से उठता रहता है। सर्वप्रथम तो ये बात समझने की है कि सम्यकसम्बुद्ध के वचन सर्बकालिक सर्वभौमिक सत्य होती है। बुद्ध उन्हीं बातों को उपदेशित करते है जो सभी काल में एक समान हों, जिनमें काल के हिसाब से परिवर्तन न हो। सामाजिक परिवेश में सामाजिक समस्याऐं जितनी बुद्ध के समय में थीं, जिनके समाधान हेतु तथागत शाक्यमुनि बुद्ध ने उपदेश किया था। आज देखने में आता है कि जीवन के प्रति ऐसी समस्याऐं पहले की अपेक्षा और अधिक दुरूह हो गईं है। मानसिक रोगियों की संख्या आज के युग में अधिक बढ़ रहीं है। पति-पत्नी में क्लेश, आपसी सम्बंधों का टूटना, बच्चों में अपराधीपन की भावना का बढ़ना, क्यों कि तृष्णाऐं बढ़ रहीं उनके बढने से अनैतिक कार्य बढ़ रहे, जिनका कहीं अन्त नहीं दिखता। शाक्यमुनि बुद्ध के समय में समाज की स्थिति कमोवेश ऐसी ही थी। तथागत बुद्ध से ऐसे समस्याओं के समाधान हेतु काल्पनिक ईश्वर के स्थान पर शीलों को अधिक महत्व दिया। इतना ही नहीं तथागत ने मनुष्य जीवन को सार्थक और सुखमय बनाने के लिए शीलों को अतिमहत्वपूर्ण कहा। यही कारण है कि शाक्यमुनि बुद्ध के संदेश सीधे साधे और व्यावाहारिक है क्यों कि वे सीधे तौर पर मनुष्य मात्र के कल्याण की बात करते हैं, प्राणी मात्र को उन्नति की शिखर पर लेके जाते है। तथागत बुद्ध के प्रमुख वचनों को अर्थात सुत्तों को देखे तो वे सभी सीधे तौर पर मनुष्य को सामाजिक समस्याओं के छुटकारा दिलाते हुए, प्राणी मात्र को परम सुख के मार्ग पर लेकर जाते हैं, जिनमें प्रमुख सुत्त हैं। मंगल सुत्त, सिगालोवाद सुत्त, व्यग्धपज्ज सुत्त, पराभव सुत्त, निधिकण्ड सुत्त आदि। ये सभी सुत्त सीधे तौर पर प्राणी मात्र केे सुखी जीवन के मूलमंत्र की व्याख्या करते है। यदि कोई सद्ग्रहस्थ उक्त सुत्तों पर वर्णित बुद्धवचनों का पालन करता है, तो वह मूलभूत शील, धनोपार्जन तथा उसके संरक्षण से सामाजिक सम्बंधों के परस्पर उत्तरदायित्वों को पूर्ण करते हुए एक सफल व्यक्ति के गुणों से परिपूर्ण होता है।तथागत शाक्यमुनि बुद्ध द्वारा देशित उपरोक्त सूत्तों में एक है व्यग्धपज्ज सूत्त जिसमें भगवान एक समृद्धि गृहस्थ को निर्देश देते हैं कि कैसे वे अपनी समृद्धि का संरक्षण और संवर्धन कर सकते हैं और कैसे धन के विनाश से बच सकते हैं।
एक बार भगवान बुद्ध जब कोलिय प्रदेश के कर्करपत्र नामक कोलियों के निगम में विहार कर रहे थे। तब दीघजानु नामक एक कोलियपुत्र भगवान के पास गया और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठ कर भगवान को सम्बोधित करते हुए प्रश्न किया।
’’भगवान! हम गृहस्थ लोग काम भोगों मे लिप्त रहते वाले हैं, पुत्रों पुत्रियों आदि परिवारिक लोगों के साथ अपनी जीवन यात्रा पूर्ण करते रहते हैं। विभिन्न प्रकार के शौन्दर्य प्रशाधन करना, सोने चांदी आदि के आभूषणों का आदि का संग्रह करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य बन गया है। हम जैसे लोगों के लिए भी भगवान आप ऐसे धम्म की देशना करें जिस का आचरण करके हमारा यह जन्म और निर्वाण तक का मार्ग सुखकर और हितकर हो सके।’’
दीघजानु कोलिय पुत्र के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान ने कहा- ’’एक गृहस्थ के जीवन में मंगल और सुख के लिए चार साधन व्यग्धपज्ज सहायक होते हैं। यह चार साधन हैं’’- सतत प्रयास की उपलब्धि, उपलब्ध की रक्षा, अच्छी मित्रता अर्थात कल्याण मित्रता, तथा संतुलित जीविका’’।
1. निरंतर प्रयास की उपलब्धि (उत्थानपाद-सम्पदा)- इसमें, जिस किसी काम से गृहस्थ आजीविका अर्जित करता है चाहे खेती से, पशुपालन से, नौकरी से, व्यापार से या अन्य किसी भी संसाधनों से उसमें उसको पारंगत अर्थात निपुण होना चाहिए और आलस्य नहीं करना चाहिए। उसे अपने कार्य के उचित तौर तरीके भली भांति जानने चाहिए और अपने कार्य में निपुणता और दक्षता हासिल करनी चाहिए। यह निरंतर प्रयास की उपलब्धि (उत्थानपाद-सम्पदा) कहलाती है।
2. उलब्ध की रक्षा अर्थात आरक्ष-सम्पदा - ’’इसमें, जो सम्पत्ति एक गृहस्थ द्वारा मेहनत, ईमानदारी और सही तरीकों से कमाई गई होती है, उसे वह ऐसे देखभाल करके ऐसे संचालन करता है, ताकि उसको राजा हडप न ले, चोर उसे चुरा न सके, आग उसे जला न सके, पानी उसे वहा न दे और न ही भटके हुए उत्तराधिकारी उसे नष्ट कर सकें। यह उलब्ध की रक्षा अर्थात आरक्ष-सम्पदा कहलाती है।
3. कल्याण मित्रता - इसमें, जिस किसी ग्राम या शहर में गृहस्थ रहता है। वह जिससे जुड़ता है, बातचीत करता है, अन्य गृहस्थों या उनके पुत्रों के साथ बहस करता है, चाहे वह वृद्ध हो या युवा वे सुसंस्कृत हों, श्रद्धा सम्पन्न हों, शील कुशलता से परिपूर्ण हों, त्याग और बुद्धि से सम्पन्न हों। वह श्रद्धालुओं की श्रद्धा के अनुसार कार्य करता है, शीलवानों के शील के साथ, त्यागियों के त्याग के साथ, प्रज्ञावानों की प्रज्ञा के साथ। यह कल्याण मित्रता कहलाती हैं। (अधिक विस्तार के लिए सिगालोवाद सूत्र का अवलोकन किया जा सकता है)
4. संतुलित जीविका या समजीविता - एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय को जानते हुए एक संतुलित जीवन यापन करता है, न फिजूलखर्ची न कंजूसी, यह जानते हुए कि उसकी आय व्यय से बढ़कर रहेगी, न कि उसका व्यय आय से बढ़कर रहेगा। जैसे कि एक तुलाधर सुनार, या उसका शार्गिद तराजू पकड़कर जानता है कि कितना झुक गया है, कितना उठ गया है, उसी प्रकार एक गृहस्थ अपनी आय तथा व्यय को जान कर संतुलित जीवन जीता है, न वह बेहद खर्चीला न बेहद कंजूस। इस प्रकार समझते हुए कि उसकी आय व्यय से बढ़कर रहेगी न कि उसका व्यय आय से अधिक होगा। यदि एक गृहस्थ कम आय वाला खर्चीला जीवन व्यतीत करेगा, तो लोग उसे कहेंगे कि यह व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ऐसे आनन्द ले रहा है जैसे कोई बेल फल खाता है। यदि एक प्रचुर आय वाला गृहस्थ कंजूसी का जीवन व्यतीत करेगा तो लोग कहेंगे कि, यह व्यक्ति भुक्कड़ की तरह मरेगा। इस प्रकार संचित धन सम्पत्ति चार प्रकार से नाश होती है-