Main Menu

विजयदशमी, सम्राट अशोक और डा0 भीमराव अम्बेडकर: बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में


यह लघु लेख विजयदशमी, सम्राट अशोक और डाॅ0 अम्बेडकर को बौद्ध धर्म के संदर्भ में समझने का प्रयास करना है। विजयदशमी को परंपरागत रूप से धर्म और न्याय की विजय का पर्व माना जाता है, किंतु बौद्ध धर्म की दृष्टि से यह अज्ञात, लोभ, द्वेष और मोह पर धम्म की विजय का प्रतीक है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपनाकर अहिंसा और करूणा का संदेश दिया। आधुनिक भारत में डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने विजयदशमी, 14 अक्टूबर 1956 के दिन नागपुर में बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर लाखों अनुयायियों को नवयान आंदोलन की ओर अग्रसर किया। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक मुक्ति का महाआंदोलन था। इस प्रकार विजयदशमी सम्राट अशोक के जीवन और उनके द्वारा किए गए धर्मांतरण से लेकर डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर की आधुनिक बौद्ध दीक्षा तक, विजयदशमी आत्मिक और सामाजिक विजय का सशक्त प्रतीक बनकर उभरती है। विजयदशमी का पर्व परंपरागत रूप से अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में मनाया जाता है। किंतु इतिहास हमें यह भी बतता है कि वास्तविक विजय केवल युद्धभूमि में शत्रु को हराने से नहीं होती, बल्कि आत्मिक और सामाजिक बंधनों से मुक्ति पाने में निहित होती है। सम्राट अशोक और डाॅ0 अम्बेडकर इस दृष्टि से भारतीय इतिहास के दो प्रमुख व्यक्तित्व हैं। 
 1. विजयदशमी और बौद्ध दृष्टिकोंण- 
 बौद्ध दृष्टिकोंण से यह पर्व व्यक्ति और समाज में व्याप्त अविद्या अर्थात अज्ञानता, लालच और द्वेष पर धम्म की विजय का प्रतीक है। बौद्ध धर्म सिखाता है कि वास्तविक विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि अपनी वासनाओं और क्लेशों पर होती है। भगवान बुद्ध ने धम्मपद में कहा है- यो सहस्सं सहस्सेन संगमे मानुसे जिने। एक४च जेय्यमत्तानं, स वे संगमजुत्तमे।। अर्थात- हजारों हजार मनुष्यों को संग्राम में जीतने वाले से भी एक अपने आपको जीतने वाला कहीं उत्तम संग्राम विजेता होता है। 
 2. सम्राट अशोक और धम्मविजय 
 सम्राट अशोक भारतीय इतिहास में ऐसे महान शासक के रूप में जाने जाते है, जिनकी पहचान केवल साम्राज्य विस्तार या राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय मूल्यों की स्थापना से जुड़ी है। उनका जीवन इस बात का साक्षी है कि किसी भी शासक की सच्ची महानता केवल युद्ध और रक्तपात से नहीं, बल्कि करूणा? अहिंसा और जनकल्याण की नीतियों से मापी जाती है। ईसा पूर्व 261 के आसपास अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। इस युद्ध में लगभग डेढ लाख लोग मारे गए और अंसख्य परिवार उजड़ गए। युद्धभूमि पर पसरी हुई लाशों और घायल मानवों की वेदना ने अशोक के मन को झकझोर दिया। उन्होंने अनुीज्ञव किया कि रक्तपात और हिंसा से स्थायी शांति प्राप्त् नहीं हो सकती। यहीं से उनके जीवन में एक गहरा परिवर्तन आया और उन्होंने हिंसक विजय की राह छोडकर करूणा और अहिंसा पर आधारित धम्मविजय का मार्ग अपनाया। अशोक ने बौद्ध धर्म को आत्मसात किया और अपने शासन की अधारशिला धम्म को बनाया। उनके अनुसार धम्मविजय का अर्थ प्रजा के हृदयों को जीतना, उनके जीवन को सुखमय औश्र सुरक्षित बनाना। उन्होंने अपने शिलालेखों में स्पष्ट लिखा कि सच्ची विजय किसी प्रदेश या प्रजा को जीतने में नहीं, बल्कि करूणा, दया और समानता के माध्यम से लोगों के मनों को जीतने में है। धम्मविजय की दिशा में अशोक ने अनेक कदम उठाए। उन्होंने पशु बलि और अनावश्यक शिकार पर रोक लगाई, स्त्रियों, दासों और कैदियों के प्रति दयालु नीति अपनाई और जनता के बीच धम्म प्रचार के लिउ धम्ममहापात्र नियुक्त किए। उन्होंने न केवल अपने साम्राज्य में बल्कि विदेशों में भी धम्म संदेश पंहुंचाने के लिए प्रखरक भेले। श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, ग्रीस जैसे देशों तक बौद्ध धर्म का प्रसार उन्हीं के प्रयासों का परिणाम था। अशोक की धम्मविजय का प्रभाव व्यापक और स्थायी था। राजनीतिक दृष्टि से उनका साम्राज्य शांति और स्थिरता का प्रतीक बना। सामाजिक दृष्टि से करूणा, मैत्री औश्र प्रज्ञा के मूल्यों का प्रसार हुआ। वैश्विक स्तर पर बौद्ध धर्म का जो विस्तार हुआ, उसने एशिया की सांस्कृतिक धारा को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रकार सम्राट अशोक का धम्मविजय केवल धार्मिक घटना नहीं थी, बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक नैतिक और आध्यात्मिक क्रांति थी। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्ची विजय तलवार और युद्ध से नहीं, बल्कि हृदयों को जीतने और समाज में करूणा एव न्याय स्थापित करने से प्राप्त होती है। 
 3. डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर और नवयान बौद्ध आंदोलनः 
 डाॅ0 भीमराव रामजी अम्बेडकर जी केवल भारत के संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म के पुवर्जागरण के महान पुरोधा भी थे। उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए आजीवन संघर्ष किया। जातिगत शोषण और भेदभाव से पीडित समाज को उन्होने नए जीवन दर्शन की राह दिखाई, जिसका परिणति नवयान बौद्ध आंदोलन के रूप में हुई। बबा साहब ने भारतीय समाज में जातिवाद और ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सामाजिक असमानता और अपमानजनक जीवन का मूल कारण माना। उन्होंने महसूस किया कि जब तक दलित और शोषित समाज उस धार्मिक ढांचे से बाहर नहीं आएगा, तब तक उन्हें वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान नहीं मिल सकता। उन्ळोंने गहन अध्ययन के बाद पाया कि बौद्ध ही ऐसा र्मा है जो समानता, करूणा, तर्क और मानवता पर आधारित है। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि पर बाबा साहब ने लगभग पाॅंच लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह दिन विजयदशमी का था, इसलिए यह अवसर सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से ऐजिहासिक बन गया। उन्होंने 22 प्रतिज्ञाऐं लेकर न केवल जातिगत बंधनों को तोड़ा बल्कि हिन्दू धर्म की असमान परंपराओं से अवने अनुयायियों को मुक्त किया। बबा साहब द्वारा स्वीकार किये गए बौद्ध धर्म को केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और आधुनिक मानवीय मूल्यों का आधार माना गया। उन्होंने बुद्ध के धम्म को आस्था से अधिक विज्ञानसंगत और तर्कसंगत मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया। 
 4. विजयदशमी का आधुनिक बौद्ध समाज में महत्व: 
 आधुनिक बौद्ध समाज में विजयदशमी का महत्व ककेवल धार्मिक दृष्टिकोंण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक नवजागरण का प्रतीक है। परंपरागत रूप् से यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक मना जाता है, किंतु बौद्ध समाजके लिए इसका विशेष महत्व इसलिए है क्यों कि विजयदशमी के दिन बाबा साहब ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर भारतीय समाज में एक नई धम्म क्रातिं का शुभारंभ किया। इस घटना ने शोषण, भेदभाव और अंधविश्वास के विरूद्ध संघर्ष कर रहे समाज को समानता, स्पतंत्रता और करूणा पर आधारित नया जीवन-दर्शन प्रदान किया। विजयदशमी सम्राट अशोक की धम्म विजय कर परंपरा से भी जुड़ती है, जिन्होने युद्ध और हिंसा छोड़कर धम्म, शांन्ति और करूणा को जीवन का आदर्श बनाया। इस प्रकार, यह दिन आधुनिक बौद्ध समाज के लिए केवल त्योहार नहीं बल्कि धम्म विजय दिवस है, जो जातिभेद, असमानता और अन्याय पर धम्म, करूणा और मानवता की विजय का प्रतीक है। इस दिन बौद्ध समाज धम्म प्रचार, दीक्षा समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम और संगठनों के माध्यम से अपने सामाजिक एवं धार्मिक संकल्पों को नवीकृत करता है और समतामूलक समाज निर्माण की दिशा में प्ररेणा प्राप्त करता है।
 निष्कर्ष 
 विजयदशमी का पर्व भारतीय परंपरा में आदिकाल से अच्छाई की बुराई पर विजय और धर्म की अधर्म पर प्रतिष्ठा के रूप में मनाया जाता रहा है। किंतु बौद्ध दृष्टिकोंण से इसका महत्व केवल पौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहन आत्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की विभीषिका देखकर समझा कि रक्तपात और हिंसा से कभी स्थायी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर धम्म विजय का मार्ग चुना और यह स्पष्ट किया कि किसी भी शासक की महानता युद्धभूमि में शत्रु पर विजय पाने से नहीं, बल्कि प्रजा के हृदयों को करूणा, दया और समानता से जीतने में हैं। अशोक को यह संदेश आज भी मानवता को प्रेरित करता है। इसी परंपरा को आधुनिक भारत में डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने नए स्वरूप में पुनर्जीवित किया। उन्होंने विजयदशमी के दिन बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करके सामाजिक समानता और स्वतंत्रता का एक नया अध्याय लिखा। यह केवल एक धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि जातिगत भेदभाव और सामाजिक शोषण के विरूद्ध मुक्ति आंदोलन था। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को केवल आस्था का नहीं, बल्कि तर्क विज्ञान और मानवीय गरिमा पर आधारित जीवन-दर्शन के रूप में प्र्रस्तुत किया। उनके नवयान आंदोलन ने बौद्ध धर्म को आधुनिक युग में सामाजिक न्याय और मानवाणिकारों का आधार बना दिया। इस प्रकार, विजयदशमी का पर्व सम्राट अशोक की धम्मविजय से लेकर बाबा साहब की बौद्ध दीक्षा तक, आत्मिक और सामाजिक विजय का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा है। आधुनिक बौद्ध समाज के लिए यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक धम्म विजय दिवस है, जो अज्ञान, लोभ और द्वेष पर धम्म, करूणा और प्रज्ञा की विजय का स्मरण कराजा है। यह दिन बौद्ध समाज को अपने संकल्पों को नवीकृत करने, सामाजिक समता और न्याय की दिशा में निरंतर प्रयास करने तथा बुद्ध, धम्म और संघ की शिक्षाओं को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। अतः विजयदशमी आज के बौद्ध समाज में आत्मिक जागरण, सामाजिक मुक्ति और मानवीय मूल्यों की पुर्नस्थापना का अमर प्रतीक बन चुकी है। 
 संदर्भ सूत्र: 
 1. धम्मपद 2. थापर, रोमिला, अशोक एंड डिक्लाइन आॅफ मौर्यास, 3. डाॅ0 अम्बेडकर, भीमराव, भगवान बुद्ध और उनक धर्म 4. नायक, बी.एन., सम्राट अशोक और धम्मनीति 5. झा, डी.एन., प्राचीन भारत का इतिहास 6. भिक्षु जगदीश काश्यप, बौद्ध धर्म और दर्शन 7. दया पवार, अम्बेडकरवादी समाज की झलक

हम सबके प्ररेणाश्रोत: बाबा सहाब भीमराव अंबेडकर


हम सबके प्ररेणाश्रोत: बाबा सहाब भीमराव अंबेडकर बाबा सहाब भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन एक ऐसा अवसर है, जब हम उनके योगदानों को याद करते हैं, और उनके विचारों से प्ररेणा लेते हैं। उनका जीवन बहुजन समाज के उत्थान, देश के विकास, बौद्ध धर्म के प्रचार बौर दुनियां को एक नई दिशा देने का सशक्त उदाहरण है। बाबा साहब ने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों में समाज के सबसे वंचित और निम्न वर्ग के अधिकारों की वकालत की। उन्होंने न केवल जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धान्तों को भी जन-जन तक पहुंचाया। उनके नेतृत्व एवं अथक प्रयासों से भारत ने एक नया संबिधान देखा, जो हर नागरिक को समान अधिकारों का आश्वासन देता हैं। बाबा साहब के ये तीन प्रमुख सिद्धान्त समानता, स्वतंत्रता और न्याय- भारतीय समाज और उसके विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं- 
 1. समानता- बाबा साहब का मानना था कि सभी मनुष्यों को जन्म से ही समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। उन्होंने जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। उनका द्रष्टिकोंण था कि समाज में कोई भी व्यक्ति जाति, धर्म, या वर्ग के आधार पर कमतर नहीं होना चाहिए। समानता के पहलू- शिक्षा- उन्होनंे शिक्षा को सभी के लिए अनिवार्य माना, ताकि हर व्यक्ति को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान हो सके। संबिधान- उन्होंने भारतीय संबिधान में समानता का अधिकार शामिल किया, जिससे सभी नागरिकों को एक समान दर्जा प्राप्त हो। 
 2. स्वतंत्रता - स्वतंत्रता का सिद्धांत उनके लिए केवल भौतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता भी थी। बाबा साहब का मानना था कि एक व्यक्ति तभी सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है, जब वह अपने विचारों को स्वतंत्रता से व्यक्त कर सकता है और अपने जीवन को अपने तरीके से जीने की स्वतंत्रता हो। स्वतंत्रता के पहलू- राजनीतिक स्वतंत्रता - वे चाहते थे कि हर नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने और चुनाव में भाग लेने का अधिकार हो। आर्थिक स्वतंत्रता - उन्होंने समाज के वंचित वर्गों को आर्थिक स्वतंत्रता दिलाने के लिए काम किया, ताकि वे अपने जीवन को बेहतर बना सकें। 
 3. न्याय - बाबा साहब ने न्याय को सामाजिक और आर्थिक दोनों  रूपों में परिभाषित किया। उनका यह सुनिश्चित दृष्टिकोंण था कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए समान अवसर उपलब्ध कराने में भी होना चाहिए। न्याय के पहलू- सामाजिक न्याय- उन्होंने सामाजिक भेदभाव को खत्म करने और वंचित वर्गों के लिए विशेष अधिकारों की वकालत की। 
आर्थिक न्याय- उन्होंने यह भी माना कि आर्थिक संसाधनों का समान वितरण ही सच्चे न्याय की पहचान है। बाबा सहाब अंबेडकर के ये तीन सिद्धांत -समानता, स्वतंत्रता और न्याय- आज भी हमारे समाज में प्रासंगिक हैं। इन सिद्धांतों को अपनाकर हम एक वेहतर समाज की स्थापना कर सकते हैं, जहां हर व्यक्ति को उसके अधिकार और अवसर मिलें। उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि एक समान, स्वतंत्रता और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करना हमारा कर्तव्य है। देश के विकास में बाबा साहब का योगदान अद्वितीय है। उन्होंने शिक्षा के महत्व को समझा और इसे समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास किया। उनके विचारों ने न केवल भारतीय समाज को जागरूक किया, बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि विकास का लाभ सभी वर्गों को मिले। बौद्ध धर्म के प्रति उनका झुकाव हमें सिखाता है कि शांति, समर्पण और करूणा का मार्ग अपनाकर ही सच्चे विकास की ओर बढ़ा जा सकता है। उन्होंने इस धर्म को अपनाकर न केवल अपने लिए, बल्कि समग्र समाज के लिए एक नई सोच का सूत्रपात किया। आज हम बाबा साहब के योगदान को याद करते हैं, हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। हमें उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। समाज में फैली असमानता, भेदभाव, और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना हमारी जिम्मेदारी है। इस जन्मदिन पर, आइए हम संकल्प लें कि हम बाबा साहब के विचारों को आगे बढ़ाऐंगे और उनके दिखाए रास्ते पर चलकर एक बेहतर समाज और राष्ट का निर्माण करेंगे। उनका जीवन हमें बताता है कि कठिनाइयों का सामना करके भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। आइए, हम सब मिलकर उनके आदर्शों को अपने जीवन में समाहित करें और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयासरत रहें।