1. विजयदशमी और बौद्ध दृष्टिकोंण-
बौद्ध दृष्टिकोंण से यह पर्व व्यक्ति और समाज में व्याप्त अविद्या अर्थात अज्ञानता, लालच और द्वेष पर धम्म की विजय का प्रतीक है। बौद्ध धर्म सिखाता है कि वास्तविक विजय दूसरों पर नहीं, बल्कि अपनी वासनाओं और क्लेशों पर होती है। भगवान बुद्ध ने धम्मपद में कहा है-
यो सहस्सं सहस्सेन संगमे मानुसे जिने।
एक४च जेय्यमत्तानं, स वे संगमजुत्तमे।।
अर्थात- हजारों हजार मनुष्यों को संग्राम में जीतने वाले से भी एक अपने आपको जीतने वाला कहीं उत्तम संग्राम विजेता होता है।
2. सम्राट अशोक और धम्मविजय
सम्राट अशोक भारतीय इतिहास में ऐसे महान शासक के रूप में जाने जाते है, जिनकी पहचान केवल साम्राज्य विस्तार या राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय मूल्यों की स्थापना से जुड़ी है। उनका जीवन इस बात का साक्षी है कि किसी भी शासक की सच्ची महानता केवल युद्ध और रक्तपात से नहीं, बल्कि करूणा? अहिंसा और जनकल्याण की नीतियों से मापी जाती है। ईसा पूर्व 261 के आसपास अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। इस युद्ध में लगभग डेढ लाख लोग मारे गए और अंसख्य परिवार उजड़ गए। युद्धभूमि पर पसरी हुई लाशों और घायल मानवों की वेदना ने अशोक के मन को झकझोर दिया। उन्होंने अनुीज्ञव किया कि रक्तपात और हिंसा से स्थायी शांति प्राप्त् नहीं हो सकती। यहीं से उनके जीवन में एक गहरा परिवर्तन आया और उन्होंने हिंसक विजय की राह छोडकर करूणा और अहिंसा पर आधारित धम्मविजय का मार्ग अपनाया।
अशोक ने बौद्ध धर्म को आत्मसात किया और अपने शासन की अधारशिला धम्म को बनाया। उनके अनुसार धम्मविजय का अर्थ प्रजा के हृदयों को जीतना, उनके जीवन को सुखमय औश्र सुरक्षित बनाना। उन्होंने अपने शिलालेखों में स्पष्ट लिखा कि सच्ची विजय किसी प्रदेश या प्रजा को जीतने में नहीं, बल्कि करूणा, दया और समानता के माध्यम से लोगों के मनों को जीतने में है।
धम्मविजय की दिशा में अशोक ने अनेक कदम उठाए। उन्होंने पशु बलि और अनावश्यक शिकार पर रोक लगाई, स्त्रियों, दासों और कैदियों के प्रति दयालु नीति अपनाई और जनता के बीच धम्म प्रचार के लिउ धम्ममहापात्र नियुक्त किए। उन्होंने न केवल अपने साम्राज्य में बल्कि विदेशों में भी धम्म संदेश पंहुंचाने के लिए प्रखरक भेले। श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, ग्रीस जैसे देशों तक बौद्ध धर्म का प्रसार उन्हीं के प्रयासों का परिणाम था।
अशोक की धम्मविजय का प्रभाव व्यापक और स्थायी था। राजनीतिक दृष्टि से उनका साम्राज्य शांति और स्थिरता का प्रतीक बना। सामाजिक दृष्टि से करूणा, मैत्री औश्र प्रज्ञा के मूल्यों का प्रसार हुआ। वैश्विक स्तर पर बौद्ध धर्म का जो विस्तार हुआ, उसने एशिया की सांस्कृतिक धारा को गहराई से प्रभावित किया।
इस प्रकार सम्राट अशोक का धम्मविजय केवल धार्मिक घटना नहीं थी, बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास में एक नैतिक और आध्यात्मिक क्रांति थी। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सच्ची विजय तलवार और युद्ध से नहीं, बल्कि हृदयों को जीतने और समाज में करूणा एव न्याय स्थापित करने से प्राप्त होती है।
3. डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर और नवयान बौद्ध आंदोलनः
डाॅ0 भीमराव रामजी अम्बेडकर जी केवल भारत के संविधान निर्माता ही नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म के पुवर्जागरण के महान पुरोधा भी थे। उन्होंने सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए आजीवन संघर्ष किया। जातिगत शोषण और भेदभाव से पीडित समाज को उन्होने नए जीवन दर्शन की राह दिखाई, जिसका परिणति नवयान बौद्ध आंदोलन के रूप में हुई।
बबा साहब ने भारतीय समाज में जातिवाद और ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सामाजिक असमानता और अपमानजनक जीवन का मूल कारण माना। उन्होंने महसूस किया कि जब तक दलित और शोषित समाज उस धार्मिक ढांचे से बाहर नहीं आएगा, तब तक उन्हें वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान नहीं मिल सकता। उन्ळोंने गहन अध्ययन के बाद पाया कि बौद्ध ही ऐसा र्मा है जो समानता, करूणा, तर्क और मानवता पर आधारित है।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि पर बाबा साहब ने लगभग पाॅंच लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह दिन विजयदशमी का था, इसलिए यह अवसर सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से ऐजिहासिक बन गया। उन्होंने 22 प्रतिज्ञाऐं लेकर न केवल जातिगत बंधनों को तोड़ा बल्कि हिन्दू धर्म की असमान परंपराओं से अवने अनुयायियों को मुक्त किया।
बबा साहब द्वारा स्वीकार किये गए बौद्ध धर्म को केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और आधुनिक मानवीय मूल्यों का आधार माना गया। उन्होंने बुद्ध के धम्म को आस्था से अधिक विज्ञानसंगत और तर्कसंगत मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया।
4. विजयदशमी का आधुनिक बौद्ध समाज में महत्व:
आधुनिक बौद्ध समाज में विजयदशमी का महत्व ककेवल धार्मिक दृष्टिकोंण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक नवजागरण का प्रतीक है। परंपरागत रूप् से यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक मना जाता है, किंतु बौद्ध समाजके लिए इसका विशेष महत्व इसलिए है क्यों कि विजयदशमी के दिन बाबा साहब ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर भारतीय समाज में एक नई धम्म क्रातिं का शुभारंभ किया। इस घटना ने शोषण, भेदभाव और अंधविश्वास के विरूद्ध संघर्ष कर रहे समाज को समानता, स्पतंत्रता और करूणा पर आधारित नया जीवन-दर्शन प्रदान किया। विजयदशमी सम्राट अशोक की धम्म विजय कर परंपरा से भी जुड़ती है, जिन्होने युद्ध और हिंसा छोड़कर धम्म, शांन्ति और करूणा को जीवन का आदर्श बनाया। इस प्रकार, यह दिन आधुनिक बौद्ध समाज के लिए केवल त्योहार नहीं बल्कि धम्म विजय दिवस है, जो जातिभेद, असमानता और अन्याय पर धम्म, करूणा और मानवता की विजय का प्रतीक है। इस दिन बौद्ध समाज धम्म प्रचार, दीक्षा समारोह, सांस्कृतिक कार्यक्रम और संगठनों के माध्यम से अपने सामाजिक एवं धार्मिक संकल्पों को नवीकृत करता है और समतामूलक समाज निर्माण की दिशा में प्ररेणा प्राप्त करता है।
निष्कर्ष
विजयदशमी का पर्व भारतीय परंपरा में आदिकाल से अच्छाई की बुराई पर विजय और धर्म की अधर्म पर प्रतिष्ठा के रूप में मनाया जाता रहा है। किंतु बौद्ध दृष्टिकोंण से इसका महत्व केवल पौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गहन आत्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक है। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की विभीषिका देखकर समझा कि रक्तपात और हिंसा से कभी स्थायी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर धम्म विजय का मार्ग चुना और यह स्पष्ट किया कि किसी भी शासक की महानता युद्धभूमि में शत्रु पर विजय पाने से नहीं, बल्कि प्रजा के हृदयों को करूणा, दया और समानता से जीतने में हैं। अशोक को यह संदेश आज भी मानवता को प्रेरित करता है।
इसी परंपरा को आधुनिक भारत में डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने नए स्वरूप में पुनर्जीवित किया। उन्होंने विजयदशमी के दिन बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण करके सामाजिक समानता और स्वतंत्रता का एक नया अध्याय लिखा। यह केवल एक धार्मिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि जातिगत भेदभाव और सामाजिक शोषण के विरूद्ध मुक्ति आंदोलन था। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को केवल आस्था का नहीं, बल्कि तर्क विज्ञान और मानवीय गरिमा पर आधारित जीवन-दर्शन के रूप में प्र्रस्तुत किया। उनके नवयान आंदोलन ने बौद्ध धर्म को आधुनिक युग में सामाजिक न्याय और मानवाणिकारों का आधार बना दिया।
इस प्रकार, विजयदशमी का पर्व सम्राट अशोक की धम्मविजय से लेकर बाबा साहब की बौद्ध दीक्षा तक, आत्मिक और सामाजिक विजय का सशक्त प्रतीक बनकर उभरा है। आधुनिक बौद्ध समाज के लिए यह दिन केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक धम्म विजय दिवस है, जो अज्ञान, लोभ और द्वेष पर धम्म, करूणा और प्रज्ञा की विजय का स्मरण कराजा है। यह दिन बौद्ध समाज को अपने संकल्पों को नवीकृत करने, सामाजिक समता और न्याय की दिशा में निरंतर प्रयास करने तथा बुद्ध, धम्म और संघ की शिक्षाओं को जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा देता है। अतः विजयदशमी आज के बौद्ध समाज में आत्मिक जागरण, सामाजिक मुक्ति और मानवीय मूल्यों की पुर्नस्थापना का अमर प्रतीक बन चुकी है।
संदर्भ सूत्र:
1. धम्मपद
2. थापर, रोमिला, अशोक एंड डिक्लाइन आॅफ मौर्यास,
3. डाॅ0 अम्बेडकर, भीमराव, भगवान बुद्ध और उनक धर्म
4. नायक, बी.एन., सम्राट अशोक और धम्मनीति
5. झा, डी.एन., प्राचीन भारत का इतिहास
6. भिक्षु जगदीश काश्यप, बौद्ध धर्म और दर्शन
7. दया पवार, अम्बेडकरवादी समाज की झलक